बाल मनोविज्ञान के शोधकर्ताओं ने अच्छे व सफल षिक्षकों के गुणों व विषेषताओं में हास्ययुक्त प्रवृति को प्रमुख रूप से प्रभावकारी पाया है। वास्तव में, अध्यापन ही एकमात्र व्यवसाय है जिसे हास्य भावना की सबसे अधिक आवष्यकता होती है क्योंकि षिक्षकों को छोटे छोटे बच्चों की व विकासषील बालकों की देखभाल, मनोवैज्ञानिक विकास, एवं शैक्षिक प्रगति को निष्चित करना होता है। विद्यालय एवं कक्षा में षिक्षक ही वह अपरिहार्य व अत्यावष्यक इकाई हंै जो जाने अनजाने में ही सही कक्षा के परिवेष पर अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ते हैं। विद्यालय में विकसित, पुष्पित व प्रस्फुटित होती हुई बालकरूपी कलियाँ षिक्षक की प्रकृति एवं व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकतीं। हास्य भावनाहीन षिक्षक बालकों को कभी अच्छे नहीं लगते और ऐसे षिक्षकों से अपनत्व अनुभव करना तो दूर, वे उनसे दूर दूर ही रहने की कोषिष करते रहते हैं, उन्हें वे खुषगवार मानने की बजाय उबाऊ करार देते हैं और उनके पास फटकना तक नहीं चाहते। अतः हास्यहीनता षिक्षकों को बड़ी महंगी पड़ती है। हमें एक चुटकला याद आता है।